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कब आयेगा वह दिन जब कोरोना नहीं रहेगा, कोई बंदिश भी नहीं रहेगी
July 6, 2020 • डॉ पंकज कुमार सोनी • विविध

कोरोना महामारी ने हमारे जीवन के मायने ही बदल दिये हैं, संकट अभी भी चहूं ओर पसरा हुआ है, भले सरकार की जागरूकता, प्रयत्नों एवं योजनाओं ने जनजीवन में आशा का संचार किया हो, लेकिन इस महाव्याधि मुक्ति के लिये अभी लम्बा संघर्ष करना होगा, मानव निर्मित कारणों से जो कोरोना महासंकट हमारे सामने खड़ा है उसका समाधान भी हमें ही खोजना होगा, उसके लिये धैर्य, संयम एवं विवेक का प्रदर्शन करना होगा। देश लॉकडाउन के नए फेज में प्रवेश कर गया है जिसे अनलॉक 2.0 कहा गया है। लॉकडाउन के चलते घरों में बंद लोग ऊब चुके हैं, उनके आर्थिक संसाधन चरचरा रहे हैं, बंदिशों को लेकर उनमें छटपटाहट है। उन्हें यह उम्मीद थी कि अनलॉक 1.0 में जितनी छूटें उन्हें मिली थीं, उसके अधिक छूटें इस दूसरे अनलॉक में भी मिलेंगी और कुल मिलाकर बंदिशें इतनी कम हो जाएंगी कि कुछ सावधानियों के साथ वे सामान्य जीवन का आनंद ले पाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि अभी कोरोना महासंकट के अधिक फैलने की स्थितियां कायम हैं। हमें चीजों को अपने नियंत्रण में करने की कोशिश करने की बजाय उन्हें लेकर दिमाग में स्पष्टता देनी होगी। निश्चितता को ढूंढ़ने की बजाय अपने अंदर साहस एवं समझदारी पैदा करनी होगी।

भारतीय जीवन में कोरोना महामारी इतनी जल्दी फैल रही है कि उसे थाम कर रोक पाना किसी एक व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है। सामूहिक जागृति लानी होगी। यह सबसे कठिन है पर यह सबसे आवश्यक भी है। अभी अनिश्चितताएं एवं आशंकाएं बनी हुई हैं कि अगर सामान्य जनजीवन पर लगी बंदिशें कम की जाएं तो कोरोना के बेकाबू होकर घर-घर पहुंच जाने का खतरा बढ़ने की संभावनाएं अधिक हैं। कोरोना संक्रमण के वास्तविक तथ्यों की बात करें तो हालात पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण एवं जटिल हुए हैं, अभी अंधेरा घना है। भले ही यह एक सुखद संकेत है कि कोरोना पीड़ितों की रोग मुक्ति का प्रतिशत लगभग 60 हो गया है, लेकिन इसका संक्रमण भी अभी तो बढ़ ही रहा है, मौत के आंकड़े भी डरा रहे हैं। कोरोना रोग के उच्चतर अवस्था में पहुंचे लोगों की जान बचाने के जीतोड़ प्रयास जारी हैं और इसमें कामयाबी भी मिल रही है। इसके बावजूद रोजाना लगभग चार सौ लोगों की मौत दिल दहला देने वाली है। विडम्बनापूर्ण स्थिति तो यह है कि अभी तक कोरोना वायरस की कोई दवा भी सामने नहीं आयी है, बिना किसी अचूक दवा के तीन स्तरों पर बीमारी से लड़ाई चल रही है। इम्युनिटी यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के व्यापक प्रयत्न हो रहे हैं, जिनमें आयुर्वेद की भी भूमिका काम कर रही है।

असल में अनलॉक 1.0 में मिली छूटों के बाद कई क्षेत्रों में जैसी लापरवाही और उसके घातक परिणाम देखने को मिले, उन स्थितियों ने अनलॉक 2.0 के प्रति सख्त होने को विवश किया। यह विवशता समझदारीभरी है। क्योंकि अभी और ज्यादा छूट देना घातक हो सकता है या स्थितियों को अनियंत्रित कर सकता है। सिनेमा, मॉल, मेट्रो और जिम का अगले आदेश तक बंद रहना बहुतों के लिये बड़ा तकलीफदेह है, लेकिन जीवन-सुरक्षा एवं महामारी को फैलने से रोकने के लिये यह जरूरी है। स्कूल-कॉलेज खुलने की तो वैसी कोई छटपटाहट नहीं है, इनको खोलने का फैसला जुलाई 2020 में लिया जाएगा। इसके लिए सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों, संस्थाओं, अभिभावकों और सभी हितधारकों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय उड़ानें, मेट्रो रेल, सिनेमा हॉल्स, जिम, स्वीमिंग पूल, एंटरटेनमेंट पार्क, थिएटर, बार और ऑडोटोरियम को फेज 3 में ही खोलने की संभावनाएं हैं। हालांकि, इससे पहले एक बार स्थिति की समीक्षा की जाएगी। तीसरे चरण में ही सामाजिक, राजनीतिक, खेल, मनोरंजन, सांस्कृतिक गतिविधियों को खोलने का फैसला लिया जाएगा। देश में रात्रिकालीन पाबंदियां अभी भी जारी रहेंगी। हालांकि इसके लिए समय में बदलाव किया गया है। प्रशासनिक निर्देशों के पालन की दृष्टि से आम जनता में सहयोग एवं सकारात्मकता का रवैया देखने को मिलना अच्छी बात है। यही कारण है कि ज्यादातर लोगों ने छूट मिल जाने के बावजूद जब तक बहुत जरूरी न हो, घर से निकलने की इच्छा को दबाए रखने में ही अपनी भलाई समझी है, लेकिन मजबूरी में या घर की कैद से ऊब कर बाहर निकले कई लोगों से सावधानी बरतने में भी भारी चूकें की हैं। इन चूकों एवं असावधानी से रोग के बढ़ने की संभावनाएं बढ़ती रही हैं। हमें यह गहराई से समझना होगा कि कोरोना तेरी मेरी नहीं यह सभी की समस्या है। कोरोना से जुड़ी स्थितियों को अपने हिसाब से देखना आसान है, पर परिणामों की अनिश्चितता से गुजरना बहुत कष्टकारी है।

हम कठिन समय को भी खुशनुमा बना सकते हैं। हम जमीन पर धूल में सने होने के बाद भी खड़े हो सकते हैं। हम वास्तव में जो चाहते हैं, उसे प्राप्त कर खुद को हैरान कर सकते हैं। ये कल्पनाएं सुखद तभी हैं जब हम कोविड-19 के साथ जीते हुए सभी एहतियात का पालन करें, सोशल डिस्टेंसिंग का कड़ाई से पालन करने और सार्वजनिक स्थानों के लिये जब भी निकलें मास्क का प्रयोग जरूरी करें एवं अपना चेहरा ढंके रखें। कुल मिलाकर सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल की स्थिति एवं अधिक से अधिक लंबा खींचने के उपाय से ही हम कोरोना से युद्ध को कम से कम नुकसानदायी बना सकते हैं। ऐसे में समाज की जागरूकता और हर किसी की सतर्कता ही हमें वायरस से बचा सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो लॉकडाउन से जुड़ी बंदिशों से छुटकारा जल्दी नहीं मिलने वाला और इस तरह की जल्दबाजी अधिक घातक हो सकती है। इंसान के जीवन को बचाने के लिये सरकार भले ही जागरूक है एवं हर स्तर पर कारगर उपाय करने में जुटी है, लेकिन कोरोना से जुड़े खतरे ऐसे हैं, जिनसे बचने के लिये हर व्यक्ति को अपने स्तर पर भी सतर्कता बरतनी ही होगी।

भले ही हमें यह पता नहीं हो कि आगे क्या होने वाला है, पर हमें यह स्वीकार करना सीखना होगा कि सब कुछ ठीक होगा, हमें अपने मन में यह भरोसा जगाना होगा कि हम चीजों को ठीक करने का रास्ता ढूंढ़ लेंगे, भले ही स्थितियां कैसी भी हों। हम कोरोना के कल के बारे में सब कुछ नहीं जान सकते, यह जानते हुए भी अनिश्चित कल की ओर बढ़ने के लिए साहस, संयम एवं विवेक तो बटोरना ही होगा। ये कांटों की बाड़ नहीं है- यह तो मर्यादाओं की रेखाएं हैं। इसको जो भी लाँघेगा, कोरोना का रावण उसे उठा ले जायेगा।

आज मनुष्य का मानस कोरोना प्रकोप में वैज्ञानिक अवनति से, आचरण की अपरिपक्वता से, अनौचित्य को साग्रह ग्रहण करने की प्रवृत्ति से विचलित है। यह युग साधारण मनुष्य का युग है। इसमें विशिष्ट देव पुरुष नहीं, साधारण मनुष्य ही कोरोना मुक्ति का इतिहास रच सकेगा। आज देश ही नहीं समूची दुनिया पंजों के बल खड़ा कोरोना मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहा है। कब होगा वह सूर्योदय जिस दिन घर के दरवाजों पर कोरोना संक्रमण को रोकने के लिये बंदिशें नहीं लगाने पड़ेंगी?

(रीता पाण्डेय "स्नेहा")