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इंसानियत का तक़ाज़ा है तेरी आंख में आंसू हों -- कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु
October 4, 2020 • डॉ पंकज कुमार सोनी • हास्य व्यंग/साहित्य

तुम्हारे शहर की हर एक हवेली पर एतराज़ है मुझको ! 

पड़ोस की झोपड़ी वाला हर शाम भूखा सो जाता है जो !! 

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हाथरस के उन ज़ालिमों को कानून की सजा मिले ऐसी ! 

हर देखने सुनने वाले ऐसे ज़ालिमों की रूह कांप जाए !! 

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हाथरस की निर्भया जैसी वीभत्स घटना पर तुम्हारा मौन अच्छा नहीं ! 

हाथरस जैसे राक्षस घूम रहे हैं मुल्क में जहां-तहां सोचो आख़िर बचोगे कैसे !! 

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हर जगह सियासत की बातें नहीं सुहाती प्यारे ! 

इंसानियत का तक़ाज़ा है तेरी आंख में आंसू हों !! 

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अपनी शर्मनाक करतूतों से किसी कन्या का अस्तित्व मिटा चैन पाओगे कैसे ! 

उस अबला की आह तुम्हें हर क्षण तड़पा तुम्हारे जुल्म का हिसाब लेगी !! 

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हाथरस का निर्भया कांड देखने और सुनने के बाद तुम्हें मर्द कहना सरासर झूठ होगा ! 

हर ऐसे मर्दों को चिन्हित कर ज़मींदोज़ कर देना अब जहां वालों का फ़र्ज़ बनता है !! 

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जुल्म और हवस की शिकार मनीषा की जलती लाश और खाकी के चेहरे पर मुस्कान ! 

मुझे समझ में नहीं आ रहा एक रक्षक की भूमिका इतनी घृणित और शर्मनाक कैसे !! 

************** तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश !