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ग़ज़लों की महफ़िल की इक्कीसवी कड़ी में नवाबी शहर लखनऊ के शायर विनोद कुमार गुप्त भावुक ने अपनी ग़ज़लों से रंग जमाया,दाद देने हौसला अफजाई में श्रोता रहे आगे
September 11, 2020 • डॉ पंकज कुमार सोनी • हास्य व्यंग/साहित्य

साहित्य:: वर्तमान कोरोना काल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काफी विसंगति आ चुकी है, ऐसा लगता है कि ज़िंदगी ठहर सी गयी है! साहित्य का क्षेत्र भी इसके दुष्प्रभावों से अछूता नहीं बचा है। विभिन्न भाषाओं के साहित्य-प्रेमियों और साहित्यकारों द्वारा वर्ष भर चलाये जाने वाले कवि सम्मेलनों, मुशायरों, सम्मान समारोहों समेत हर प्रकार के आयोजनों पर रोक लग गयी है। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की अदम्य जीजिविषा उसे हर परिस्थिति का अनुकूलन करने में सक्षम बना देती है, सो हम सबने इस भीषण अवसाद की घड़ी में भी ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीने के लिये नये-नये रास्तों की तलाश कर ली है। ज़िंदगी की इसी खोज़ का परिणाम है कि नवीन संचार माध्यमों का सहारा लेकर हम अपने-अपने घरों में क़ैद होते हुये भी वेबीनार या साहित्य-समारोहों का आयोजन कर रहे हैं। इसीलिए हम देख पा रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों से साहित्यिक-साँस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के निमित्त फेसबुक लाइव एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। फेसबुक लाइव के माध्यम से हम अपने पसंदीदा कवियों-शायरों से रूबरू होकर उनकी रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं ।

इसी क्रम में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन में लगी हुई ऐतिहासिक संस्था "पंकज-गोष्ठी" भी निरंतर क्रियाशील है। "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के तत्वावधान में चलने वाली प्रख्यात साहित्यिक संस्था "गजलों की महफ़िल (दिल्ली)" भी लगातार आॅनलाइन मुशायरों एवं लाइव कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।

"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के अध्यक्ष डाॅ विश्वनाथ झा ने हमारे संवाददाता को बताया कि "न्यास" की ओर से हम भारत के विभिन्न शहरों में साहित्यिक और साँस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इसी क्रम में "ग़ज़लों की महफिल (दिल्ली)" की ओर से आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" में शायरों के अलावा ग़ज़ल गायकों को भी सप्ताह में एक दिन आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया, ताकि पटल के शायरों की ग़ज़लों को स्वर बद्ध कर करके ग़ज़ल प्रेमियों तक पहुँचाया जा सके, साथ ही साथ नामचीन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों को भी सुना सके। 

अतः 15 अगस्त 2020 से यह प्रख्यात संस्था "ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)", अपने लाइव कार्यक्रम श्रृंखला के दूसरे चरण में प्रवेश कर गयी है। इस दूसरे चरण के कार्यक्रम में लाइव @ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की 21वीं प्रस्तुति के रूप में आज, बृहस्पतिवार, 10 सितम्बर, 2020, शाम 4 बजे से लखनऊ के चर्चित शायर आदरणीय विनोद कुमार गुप्त 'भावुक' जी ने अपनी ख़ूबसूरत और धारदार ग़ज़लें सुनाकर आज की शाम को एक यादगार शाम बना दिया। व्यंग्य की तेज़ धार वाली पढ़ी गयी 'भावुक' जी ग़ज़लों ने तो जादू ही कर दिया और सबको लगभग सवा घंटे तक बाँधे रखा रखा।

ठीक 4 बजे आदरणीय आदरणीय विनोद कुमार गुप्त 'भावुक' जी पटल पर उपस्थित हो गए और तबसे लगभग सवा घंटे तक वे एक से बढ़कर एक बेहतरीन ग़ज़लें सुनाते रहे।

जब उन्होंने अपनी ग़ज़ल:

तूफ़ाँ का दौर नाव है मँझधार क्या करें ।

माँझी पे नहीं एक भी पतवार क्या करें ।

होली मिलन पे कत्ल यहाँ ईद पे दंगा,

इंसान मर चुका है त्योहार क्या करें ।

सुनायी तो सबके मुँह से वाह वाह निकलने लगे।

फिर भावुक जी की इस ग़ज़ल:

हे प्रभु विनती यही है अब तेरे दरबार में ।

देश का कुछ भी हो लेकिन हम रहें सरकार में।

कोई ‘भावुक’ रात दिन आकर हिलाये दुम अगर,

फेंक दें उस ओर भी कुछ रोटियाँ उपकार में।

पर भी 'भावुक' जी ने भरपूर दाद बटोरी।

भावुक जी की इस ग़ज़ल:

प्यार का इश्तहार हैं ग़ज़लें।

मेरे दिल का ग़ुबार हैं गजलें।

एक ‘भावुक’ का दर्द ढोने को,

बनके आयीं कहार हैं ग़ज़लें।

पर तो लोग फिदा हो गये।

भावुक जी की इस ग़ज़ल:

नज़र कुछ कुछ झुका करके बुलाना हम न भूलेंगे।

वो उँगली दांत के नीचे दबाना हम न भूलेंगे ।

दिये जो घाव गैरों ने भरेंगे एक दिन ‘भावुक’,

मगर ताउम्र अपनों का निशाना हम न भूलेंगे ।

से तो श्रोतागण भावविभोर हो गये।

भावुक जी की इस खूबसूरत ग़ज़ल:

क्या हो रहा है आज के हिन्दोस्तान में।

ईमान बिक रहा है यहाँ हर दुकान में ।

चिंगारियाँ जनाब ज़रा मत उछालिये,

बारूद सी बिछी है यहाँ हर मकान में।

की भी काफ़ी सराहना हुई।

भावुक जी की मौज़ूदा व्यवस्था पर तंज़ सकती इस ग़ज़ल:

क्या हो रहा है आज के हिन्दोस्तान में।

ईमान बिक रहा है यहाँ हर दुकान में ।

चिंगारियाँ जनाब ज़रा मत उछालिये,

बारूद सी बिछी है यहाँ हर मकान में।

को भी श्रोताओं द्वारा ख़ूब पसंद किया गया।

फिर उनकी इस ग़ज़ल:

हूँ दिवानों में मैं भी गिना देख लो।

मेरा मुझसे ही सब कुछ छिना देख लो।

तेरा ‘भावुक’ शहंशाह हो जायेगा,

प्यार की दे के तुम दक्षिणा देख लो।

पर तो तालियों की गड़गड़ाहट से महफ़िल गूँजने लगी।

सच कहें तो आदरणीय श्री विनोद कुमार गुप्त भावुक जी द्वारा पढ़ी गयी धारदार ग़ज़लों से महफ़िल का वातावरण बेहद जीवंत हो गया और बार-बार पेज पर तालियों की बौछार होती रही तथा कैसे सवा घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। मंत्रमुग्ध होकर हम सभी भावुक जी को सुनते रहे, पर दिल है कि भरा नहीं।

इस तरह कहा जा सकता है कि अपनी धारदार शैली में अपनी बेहतरीन ग़ज़लें सुनाकर भावुक जी ने सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया, यानी कि महफ़िल लूट ली।

डाॅ विनोद कुमार गुप्त भावुक जी के फ़ेसबुक लाइव देखने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें 

https://www.facebook.com/groups/1108654495985480/permalink/1494350254082567/

   लाइव@ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के नाम से चर्चित फेसबुक के इस लाइव कार्यक्रम की विशेषता यह है कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले से ही, शाम 4 बजे से ही दर्शक-श्रोता पेज पर जुटने लगते हैं और कार्यक्रम की समाप्ति तक मौज़ूद रहते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ, महफ़िल की 21वीं कड़ी के रूप में आदरणीय श्री विनोद कुमार गुप्त 'भावुक' जी जब तक अपना कलाम सुनाते रहे, रसिक दर्शक और श्रोतागण महफ़िल में जमे रहे।

"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत) द्वारा आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" के इस कार्यक्रम का समापन टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की ओर से डाॅ अमर पंकज जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

कार्यक्रम के संयोजक और ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के एडमिन डाॅ अमर पंकज ने लाइव प्रस्तुति करने वाले शायर आदरणीय श्री विनोद कुमार गुप्त 'भावुक' के साथ-साथ दर्शकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट करते हुए सबों से अनुरोध किया कि महफ़िल के हर कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़कर टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) का उत्साहवर्धन करते रहें।

डाॅ अमर पंकज ने टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के सभी साथियों, डाॅ दिव्या जैन जी , डाॅ यास्मीन मूमल जी, श्रीमती रेणु त्रिवेदी मिश्रा जी, श्री अनिल कुमार शर्मा 'चिंतित' जी, श्री पंकज त्यागी 'असीम' जी और डाॅ पंकज कुमार सोनी जी के प्रति भी अपना आभार प्रकट करते हुए उन्हें इस सफल आयोजन-श्रृंखला की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित की।