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बागी विधायकों पर राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने का सुप्रीम कोर्ट का इंकार, कहा असहमति की आवाज दबा नहीं सकते
July 23, 2020 • डॉ पंकज कुमार सोनी • राष्ट्रीय

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी की प्रदेश के हाई कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने वाली याचिका पर रोक लगाने से मना कर दिया है. विधानसभा अध्यक्ष ने कांग्रेस के 19 बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही को 24 जुलाई तक टाले जाने के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ बुधवार को उच्चतम न्यायालय का रुख किया था.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाई कोर्ट अपना फैसला सुना सकती है. 24 जुलाई को हाई कोर्ट में फैसला आना है.

शीर्ष अदालत ने ये भी कहा कि राजस्थान उच्च न्यायालय का आदेश सुप्रीम कोर्ट में लंबित विधानसभा अध्यक्ष की याचिका पर सुनाए गए फैसले के दायरे में होगा.

विधानसभा स्पीकर की तरफ से दलील देते हुए कपिल सिब्बल ने शीर्ष अदालत से कहा कि वो राजस्थान कोर्ट में चल रही कार्यवाही पर रोक लगाए. लेकिन अदलात ने इससे इंकार कर दिया.

जस्टिस अरूण मिश्रा ने विधानसभा स्पीकर की याचिका पर सुनवाई के दौरान सिब्बल से पूछा कि ‘क्या जनता के द्वारा चुना हुआ व्यक्ति अपनी असहमति भी जाहिर नहीं कर सकता’.

उन्होंने कहा, ‘असहमति को दबाया नहीं जा सकता. लोकतंत्र में क्या किसी को इस तरह चुप कराया जा सकता है?’

राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष सी. पी. जोशी ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि उच्च न्यायालय को कांग्रेस के 19 बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही 24 जुलाई तक रोकने का कोई अधिकार नहीं है. इन बागी विधायकों में उपमुख्यमंत्री पद से हटाए गए सचिन पायलट भी शामिल हैं.

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता में एक पीठ ने जोशी की उस याचिका पर सुनवाई शुरू की, जिसमें शीर्ष अदालत के 1992 के किहोटो होलोहन मामले में दिए फैसले का जिक्र किया गया है. उस फैसले के अनुसार अदालत संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष द्वारा की गई अयोग्यता की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

जोशी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब अध्यक्ष सदन के किसी सदस्य को निलंबित या अयोग्य ठहराने का फैसला ले.

पीठ के उस सवाल के जवाब में सिब्बल ने यह बात कही, जिसमें उसने पूछा था कि अध्यक्ष के विधायकों को निलंबन या आयोग्य ठहराने के फैसले में अदालत हस्तक्षेप कर सकती है या नहीं.