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अटल जी के बाद टंडन का जाना, लखनऊ की सियासत का एक ‘युग’ समाप्त होने जैसा- रीता पांडेय स्नेहा
July 23, 2020 • डॉ पंकज कुमार सोनी • विविध

  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आज एक साथ दो खबरें थोड़े अंतराल के बाद आईं। पहली खबर यह थी कि मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन का एक निजी अस्पताल में देहांत हो गया। यह खबर आने के चंद घंटों के भीतर ही उत्तर प्रदेश की राज्यपाल माननीय आनंदीबेन पटेल को यूपी के साथ-साथ मध्य प्रदेश का भी राज्यपाल बना दिया गया है। अभी तक आनंदी बेन कार्यवाहक राज्यपाल के रूप में मध्य प्रदेश का काम देख रही थीं। अगर यह कहा जाए की लालजी टंडन और लखनऊ एक-दूसरे के पूरक थे तो अतिशियोक्ति नहीं होगी। 85 वर्ष की उम्र में करीब 40 दिनों की बीमारी के बाद लालजी टंडन का देहांत हो गया। लाल जी टंडन लखनऊ के ‘हस्ताक्षर’ थे, जिन लोगों ने लखनऊ की शान में चार चांद लगाए उसमें से लालजी टंडन एक बड़ा ‘मुकाम’ थे। लालजी टंडन जी को लोग विकास पुरूष के नाम से भी बुलाते थे।

लखनऊ की हर गली-मौहल्ले से लालजी टंडन का अटूट ‘रिश्ता’ था। लखनऊ वाले टंडन जी को लोग प्यार से बाबूजी कहकर संबोधित किया करते थे। भले ही टंडन जी का राजनीति में कद काफी ऊंचा था, लेकिन लखनऊ के लोगों के सुख-दुख में वह सहज उपलब्ध रहते थे। कई दशकों तक टंडन जी बड़े-बड़े कार्यक्रमों से लेकर लखनऊ की नुक्कड़ सभाओं तक का चेहरा बने रहे थे। लालजी टंडन ने सियासत ने अपनी सियासत की शुरूआत 1960 से की थी और 60 वर्षो के लम्बे सियासी सफर में आप ने पार्षद से लेकर गवर्नर तक कई पद संभाले। प्रदेश में जब कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी तो टंडन जी उसमें कैबिनेट मंत्री रहे। लालजी टंडन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के साथ भी जुड़े हुए थे। रामजन्म भूमि आंदोलन में टंडन ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। लालजी टंडन, बसपा सुप्रीमों मायावती को अपनी बहन मानते थे और उनसे राखी बंधवाते थे, लेकिन राजनीति के जानकार इस बहन-भाई की जोड़ी को सियासी नजरिये से ज्यादा देखते थे। नब्बे के दशक में प्रदेश में बीजेपी और बसपा गठबंधन की सरकार बनाने में भी उनका अहम योगदान माना जाता है।

लालजी टंडन की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़वा के दौरान ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात हुई। दोनों नेता जब एक बार मिले तो रिश्ते लगातार मजबूत होते गए। लालजी अक्सर कहते मिल जाते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति में उनके साथी, भाई और पिता तीनों की भूमिका अदा की। लालजी टंडन जी ने पार्षद के रूप में अपनी सियासी पारी शुरू की थी। इसके बाद 1978 से 1984 और 1990 से 96 तक टंडन दो बार उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे। 19991 से 92 की यूपी सरकार में वह मंत्री भी बने। इसके बाद लालजी टंडन 1996 से 2009 तक लगातार तीन बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। 1997 में फिर से वह नगर विकास मंत्री बने। टंडन को यूपी की राजनीति में कई अहम प्रयोगों के लिए भी जाना जाता है। टंडन पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी को ‘हनुमान’ जी की तरह पूजते थे। अटल जी को लखनऊ से चुनाव लड़ाने में लालजी टंडन का विशेष योगदान रहा था। 2009 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद लखनऊ लोकसभा सीट खाली हो गई थी। इसके बाद भाजपा ने लालजी टंडन को ही यह सीट सौंपी थी। लोकसभा चुनाव में लालजी टंडन ने लखनऊ लोकसभा सीट से जीत हासिल की और संसद पहुंचे। लालजी टंडन को साल 2018 में बिहार के राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 2019 में उन्हें एमपी का राज्यपाल बनाया गया था।

लालजी टंडन ने एक किताब भी लिखी थी। अपनी लिखी किताब ‘अनकहा लखनऊ’ में उन्होंने कई खुलासे किए थे। इसमें उन्होंने पुराना लखनऊ के लक्ष्मण टीले के पास बसे होने की बात कही थी। लालजी टंडन की पुस्तिका के मुताबिक, लक्ष्मण टीला का नाम पूरी तरह से मिटा दिया गया है। अब यह स्थान टीले वाली मस्जिद के नाम से जाना जा रहा है। उनके अनुसार, लखनऊ की संस्कृति के साथ काफी जबरदस्ती हुई है। लखनऊ के पौराणिक इतिहास को नकार ‘नवाबी कल्चर’ में कैद करने की कुचेष्टा के कारण यह हुआ। लक्ष्मण टीले में शेष गुफा थी, जहां बड़ा मेला लगता था। खिलजी के वक्त यह गुफा ध्वस्त की गई। बार-बार इसे ध्वस्त किया जाता रहा और यह जगह टीले में बदल गई। बाद में औरंगजेब ने यहां एक मस्जिद बनवा दी।

लालजी टंडन के ऐसा लिखे जाने पर काफी बवाल भी हुआ था, लेकिन इसके उलट यह भी हकीकत थी कि टंडन को चाहने और मानने वालों में हिन्दू-मुसलमान सभी वर्ग के लोग शामिल थे। टंडन मुसलमानों के आयोजनों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। कई बार टंडन पार्टी से अलग हटकर मुसलमानों के साथ जुड़े नजर आ जाते थे। टंडन जी के पुत्र आशुतोष टंडन योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। दो वर्ष के भीतर पहले अटल बिहारी वाजपेयी का और उसके बाद अब लालजी टंडन का देहांत लखनऊ की सियासत के एक युग के समाप्त होने जैसा है।

रीता पांडेय स्नेहा